भारतीय वसुन्धरा पर समय-समय पर अनेक महापुरषों ने जन्म लिया और अपने व्यक्तित्व एवं कृतित्व से जन-जन को प्रभावित किया। ऐसे ही एक महापुरुष हैं परम पूज्य संतशिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के आज्ञानुवर्ती शिष्य परम पूज्य मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज जिन्हें परम जिनधर्म प्रभावक, प्राचीनतीर्थ जीर्णोद्धारक, वास्तुविद्, सिद्धवाक्, मिथ्यात्वभंजक, नवतीर्थ प्रतिष्ठापक, अध्यात्मवेत्ता, जैन धर्म-दर्शन-साहित्य-संस्कृति संरक्षक, विद्वदगुणानुरागी, इतिहास निर्माता, श्रावक संस्कार शिविर प्रवर्तक, शिक्षानुरागी, परम वात्सल्य के धनी आदि अनेक उपाधियों से अभिमंडित कर श्रमण-श्रावक समाज ने उनके प्रति जहाँ अपना बहुमान प्रकट किया है वहीं उनके कार्यों के प्रति कृतज्ञता भी व्यक्त है। उनकी साधना श्रमण संस्कृति से समन्वित है, उर्ध्वगामी है, उत्कृष्टता से युक्त है। उनमें अपने गुरु एवं परम्परा के प्रति अगाध श्रद्धा है। यही विशेषता उनके गुणों को अप्रितम बनाती है, स्मरणीय बनाती है । यही कारण है कि आज जैनाजैन समाज उनके प्रति नतमस्तक है ।
मुनिपुंगवश्री सुधासागर जी महाराज का जन्म स्थान जिला-सागर (म.प्र.) स्थित ग्राम – ईशुरवारा है; जहाँ आपने श्रावक श्रेष्ठी श्री रूपचन्द्र जैन के घर उनकी सहधर्मिणी श्रीमति शान्तिबाई जैन की कुक्षि से श्रवण शुक्ल सप्तमी (मोक्षसप्तमी), संवत् 2015 तदनुसार दि. 21 अगस्त 1958, दिन गुरूवार को जन्म लिया। आपका नाम ‘जयकुमार’ रखा गया। मुझे ऐसा प्रतीत होता है की जैन धर्म के 23 वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ की तरह आत्मविजय के पथ पर चलें और अपने ‘जय’ नाम को सार्थक करें। आज यह प्रतीति सत्य प्रतीत होती दिखाई दे रही है ।
श्री जयकुमार ने जैनधर्म एवं समाज सेवा का संकल्प लिया और तदनुरूप कार्य करते हुए-
(1) श्री दिगम्बर जैन पाठशाला (रात्रिकालीन), ईशुरवारा (सागर)
(2) श्री शांतिनाथ वाचनालय, ईशुरवारा (सागर, म.प्र.) की स्थापना की।
आपकी प्रवृत्ति जिज्ञासु, जुझारू, कर्त्तव्य परायण एवं सेवाभाव की रही। फलस्वरूप आप अपने ग्राम श्री दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र इशुरवारा आने वाले साधुजनों कि समुचित सेवा/वैयावृत्ति करते और उनके प्रवास एवं विहार कि व्यवस्था करते। ऐसा करते हुए आपको अत्यंत आनंद कि अनुभूति होती। वे मानते थे कि वैयावृत्ति को तप के अन्दर समाहित किया गया है। यह दान भी है। बिना साधुजनों की वैयावृत्ति के निरोग शरीर एवं ताप के फल की प्राप्ति नहीं होती।
आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज के प्रथम दर्शन
आपने प्रथम बार संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के दर्शन सन 1977 में श्री दिगम्बर जैन सिद्ध क्षेत्र कुण्डलपुर (म.प्र.) में किये और दर्शन क्या किये; उन्ही को निहारते हुए मन ही मन उन्ही के पथ का अनुगामी बनने का संकल्प ले लिया। यह संकल्प उनकी संगती पाकर और बलबन हुआ; जिसे हम सब आज प्रत्यक्ष देख रहे है।
आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज से श्री दिगम्बर जैन सिद्ध क्षेत्र नैनागिर जी में दिनांक 19 अक्टूबर 1978 को ब्रम्हचर्य व्रत ग्रहण किया। “ते गुरु में उर बसों, तारण तरण जिहाज की भावना भरकर सच्चे गुरु के प्रति समर्पण का संकल्प लिया। आज भी यह संकल्प पूरी आस्था, निष्ठा के साथ विधमान है। ब्रम्हचर्य का तेज उनमे देखा जा सकता है।
ब्रम्हचर्य व्रत की साधना करते हुए ब्र. जयकुमार आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के दर्शनार्थ दि. 8 जनवरी, 1980 को नैनागिर पहुचे और उनसे निवेदन किया कि “भारतवर्षीय तीर्थक्षेत्र की वन्दना करने के लिए जाना चाहता हूँ, आपका सुभाशीर्वाद चाहिये;” तो आचार्य श्री मुस्कुरा दिए और बोले “क्या स्वयं तीर्थ बनने के साधना का मानस है? तुम स्वयं भी तीर्थ बन सकते हो। यदि मैं तुम्हे ही तीर्थ बना दू तो ? ” ब्र. जयकुमार को यही तो चाहिये था, उन्होंने तीर्थयात्रा पर जाने का विचार निरस्त किया और स्वयं तीर्थ बनने के लिए आचार्यश्री को श्रीफल समर्पित कर दिया। उनका जीवन संतमय तो दो वर्ष पूर्व से ही था। अब तो वंदनमुक्ति प्रत्यक्ष दिख रही थी।
दिनांक 10 जनवरी सन1980 को नैनागिर मैं संत शिरोमणि आचार्य 108 श्री विद्यासागर जी महाराज से क्षुल्लक दीक्षा ग्रहण की और नाम पाया- क्षुल्लक श्री परमसागर। इस तरह एक नया जन्म हुआ। नया संकल्प कि आत्महित सर्वोपरि है। क्षुल्लक अवस्था में मुक्तागिरी तीर्थ पर आपको लगातार 12 दिन तक अन्तराय हुए, 13 वे दिन आहार संपन्न हो सका किन्तु आप अपनी साधना से डिगे नहीं अपितु आत्मविजय की और अग्रसर रहे।