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मुनिश्री पूजन 

जैन परंपरा में पूजन श्रद्धा व्यक्त करने मात्र नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और गुणानुकरण का अभ्यास है। देव-शास्त्र-गुरु की वंदना द्वारा श्रद्धालु विनय, संयम और विवेक को जागृत करने का प्रयास करते हैं तथा वीतराग गुणों का स्मरण कर स्वयं को पवित्र बनाते हैं।

मुनिश्री सुधासागर जी के पूजन में नमोकार मंत्र से आरम्भ कर नमस्कार, वंदना और गुणगान किया जाता है, जिससे मन साधु जीवन के आदर्शों की ओर प्रेरित होता है। इस अवसर पर क्षमा, दया और अहिंसा को जीवन में अपनाने का संकल्प लिया जाता है — यही गुरु पूजन की वास्तविक साधना है।

मुनिश्री भजन
हे गुरुदेव सुधासागर, ज्ञान प्रकाश तुम्हारा, |

हे गुरुदेव सुधासागर, ज्ञान प्रकाश तुम्हारा,

मन मंदिर में जगमग करता वीतराग उजियारा।

संयम की राह दिखाओ, मिटे मोह अंधियारा,

चरणों में शांति मिले, यही जीवन हमारा॥

भवसागर से पार लगाओ, दो समता का सहारा,

तुमसे सीखा क्षमा का पथ, त्याग तपोभव धारा।

मन की चंचल लहर थमे, जपे नवकार हमारा,

अंतर जागे आत्मदीप, मिटे कर्म अंधियारा।

वचन तुम्हारे अमृत सम, जग में सच्चा तारा,

गुरु चरणों की धूलि बने, जीवन सफल हमारा॥