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श्रावक संस्कार शिविर

जो व्यक्ति स्वयं को मुनि बनने के योग्य नहीं पाते, वे श्रावकत्व को अंगीकार करते हैं। मुनिश्री का यह सतत प्रयास रहता है कि अधिक से अधिक गृहस्थजन श्रावक धर्म को अपनाएँ। इसी उद्देश्य से वे प्रति वर्ष श्रावक संस्कार शिविर आयोजित करने की प्रेरणा देते हैं।

इन शिविरों के मूल में मर्यादित आचरण प्रमुख होता है। आहार-विहार की मर्यादा, आचार-विचार की मर्यादा, दान और धर्म की मर्यादा, त्याग और भोग की मर्यादा—इन सभी का ध्यान रखना आवश्यक है। ये सभी मर्यादाएँ हमें श्रावक संस्कार शिविर में मुनिश्री के सान्निध्य में प्रत्यक्ष रूप से देखने को मिलती हैं।

वास्तव में यह मर्यादा-बोध की दस दिवसीय पाठशाला है, जिसमें प्रवेश लेकर गृहस्थजन सच्चे अर्थों में श्रावक बनते हैं। बालक, युवा और वृद्धों में श्रावक संस्कार जागृत कराने के उद्देश्य से मुनिश्री की यह अभिनव प्रेरणा रही है, जिसके परिणामस्वरूप हजारों लोगों का जीवन व्यसनमुक्त एवं धर्ममय हो गया है।

ललितपुर, अजमेर, मदनगढ़-किशनगढ़, जयपुर, नारेली, सीकर, अलवर, कोटा, बिजौलियां, केकड़ी, सूरत, भिंडर, उदयपुर, खांदू कॉलोनी (बांसवाड़ा), चमकार जी, टोंक, जबलपुर, गुना आदि स्थलों पर वर्ष 2014 तक 23 श्रावक संस्कार शिविर आयोजित हो चुके हैं। इन शिविरों में उपस्थित जनसमूह ने जिस प्रकार आजीवन व्यसनों का त्याग किया है, वह अत्यंत अनुकरणीय है।

परम पूज्य मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज द्वारा सन् 1991 में प्रारंभ किए गए इस समाज-संरचना अभियान को अनेक संतों ने अपनाया है। फलस्वरूप प्रति वर्ष पर्युषण पर्व में अनेक स्थानों पर श्रावक संस्कार शिविर आयोजित किए जाने लगे हैं।

मानव प्रतिष्ठा के इस कार्य के माध्यम से मनुष्य एवं समाज को धर्मयुक्त और व्यसनमुक्त बनाने की दिशा में मुनिश्री ने उन विकृतियों पर विराम लगाने के लिए प्रेरित किया है, जो मनुष्य को पतन की ओर ले जाती हैं या समाज में विसंवाद उत्पन्न करती हैं।

इसी क्रम में मद्य, मांस, मधु, जमीकंद, रात्रि भोजन एवं मृत्यु भोज का त्याग; गर्भपात एवं कन्या भ्रूण हत्या के विरुद्ध जनजागरण; धर्मतीर्थों एवं धर्मशालाओं की पवित्रता बनाए रखने हेतु जैनोचित क्रियाओं का उपयोग; रात्रि में जिनाभिषेक एवं पूजन का निषेध आदि प्रमुख कार्य हैं, जिनके यथेष्ट प्रतिफल अब स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे हैं।

 

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