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जीव दया केवल एक नैतिक गुण

जीव दया केवल एक नैतिक गुण

जैन दर्शन में जीव दया केवल एक नैतिक गुण नहीं, बल्कि धर्म का मूल आधार मानी गई है। प्रत्येक जीव—चाहे वह मनुष्य हो, पशु-पक्षी, कीट या सूक्ष्म प्राणी—आत्मा से युक्त है और सुख-दुःख का अनुभव करता है। इसलिए किसी भी जीव को पीड़ा पहुँचाना आत्मा की शुद्धि के मार्ग में बाधा माना गया है। अहिंसा का सिद्धांत इसी जीव दया की व्यापक भावना से उत्पन्न होता है।

जीव दया का अर्थ केवल हिंसा न करना नहीं, बल्कि सक्रिय करुणा भी है। प्यासे प्राणी को जल देना, घायल पशु की सेवा करना, पर्यावरण की रक्षा करना और संसाधनों का संयमित उपयोग करना—ये सब जीव दया के ही रूप हैं। जब मनुष्य अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर अन्य प्राणियों के अस्तित्व को स्वीकार करता है, तब उसके भीतर संवेदनशीलता और समता विकसित होती है।

जैन आचार में यह स्पष्ट किया गया है कि क्रोध, लोभ और मोह से प्रेरित व्यवहार हिंसा को जन्म देता है। इसलिए जीव दया का अभ्यास बाहरी आचरण से पहले भीतर की वृत्तियों को संयमित करने से प्रारंभ होता है। विचारों की शुद्धता, वाणी की मधुरता और कर्मों की सावधानी—ये तीनों मिलकर सच्ची जीव दया का निर्माण करते हैं।

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