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आरती गुरु प्रमाण की

आरती भ्रम निवारती, संकटों को टालती आरती गुरु प्रमाण की श्री गुरु प्रमाण जी! मोक्ष पथ के सारथी! तव पदों में रमें नित्य मेरी मति आरती भ्रम निवारती० जो पिता सुरेंद्र की आँखों के तारे हैं माता श्री सोहिनी देवी के दुलारे हैं विद्यासागरार्य के चमकते सितारे हैं आरती भ्रम निवारती० सर्व शंकाओं के स्वयं समाधान हैं प्रणेता श्री गुणायतन,स्वयं

विद्यागुरु  के दर्शन  

विद्यागुरु  के दर्शन  का, रामटेकजी  बहाना  है | गुरुवर  जब बुलाएंगे ,हमें दौड़े चले जाना है || विद्यागुरु के  दर्शन  का। ….. तुम्ही मेरे  माता  पिता ,तुम्ही बंधु  सखा | दुनिया  वाले दुनिया  वाले क्या  जाने ,मुझे  गुरु  ने  जाना  है || विद्यागुरु के  दर्शन  का। ….. सूरज में ढूँढा  तुम्हे ,चंदा  में  पाया है | तारों  के तारों  के

मुनिश्री विद्यासागर जी की आरती

विद्यासागर की, गुणआगर की, शुभ मंगल दीप सजाय के। आज उतारूँ आरतिया…..॥1॥ मल्लप्पा श्री, श्रीमती के गर्भ विषैं गुरु आये। ग्राम सदलगा जन्म लिया है, सबजन मंगल गाये॥ गुरु जी सब जन मंगल गाये, न रागी की, द्वेषी की, शुभ मंगल दीप सजाय के। आज उतारूँ आरतिया…..॥2॥ गुरुवर पाँच महाव्रत धारी, आतम ब्रह्म विहारी। खड्गधार शिवपथ पर चलकर, शिथिलाचार निवारी॥

अहिंसा : केवल सिद्धांत नहीं, जीवन शैली

अहिंसा जैन धर्म का मूल आधार है। यह केवल किसी को कष्ट न देने तक सीमित नहीं, बल्कि विचार, वाणी और कर्म—तीनों में करुणा का भाव रखने की शिक्षा देती है। अहिंसा को अपनाकर व्यक्ति आत्मशांति और सामाजिक सद्भाव की ओर अग्रसर होता है।

संयम से आत्मबल का विकास

संयम इच्छाओं पर नियंत्रण का मार्ग है। जब व्यक्ति भोग से ऊपर उठकर आत्मसंयम को अपनाता है, तब भीतर छिपी आत्मशक्ति प्रकट होती है। जैन दर्शन के अनुसार संयम ही सच्ची स्वतंत्रता की कुंजी है।

ज्ञान और श्रद्धा का संतुलन

केवल ज्ञान या केवल श्रद्धा—दोनों अधूरे हैं। जैन परंपरा में ज्ञान को श्रद्धा और आचरण से जोड़कर देखा गया है। जब ज्ञान जीवन में उतरता है, तभी वह आत्मकल्याण का साधन बनता है।